केंद्रीय बजट आने वाला है। रेल बजट आ चुका है। अखबार हो टेलीविजन या अन्य माध्यम। इन दिनों सिर्फ एक ही चर्चा है कि लोगों को सरकार से क्या क्या उम्मीदें। जनता की भलाई के लिए सरकार को क्या करना चाहिए। इनकम टैक्स, सर्विस टैक्स, एक्साइज टैक्स, निर्यात, उद्योग सभी लोगों को सरकार से उम्मीदें हैं। सभी को रियायत चाहिए। अभी काफी कुछ कमा ले रहे हैं पर कुछ और कमाने व बचाने के की गुंजाइश चाहिए। आम आदमी मंहगाई से राहत के लिए सरकार से छूट की उम्मीद संजो रहा है। इसके अलावा बजट में कुछ ऐसा हो कि सबको मकान, मिले सड़के चिकनी बन जाएं। चौबीस घंटे बिजली आए और न जाने क्या क्या। अनुमान, ये होगा तो ऐसा होगा। और वो होगा तो वैसा होगा। आम ओ खास की राय न जाने क्या क्या छप दिख रहा है। इन विचारों व उम्मीद की बाढ़ में एक भी शख्स या एक भी खबर नहीं दिखायी देती जिसमें लोग देश व समाज के लिए कुछ करने की बात करते हों या खुद देश व समाज के प्रति कुछ करने की उम्मीद जगाते हों। क्या सदैव खुद के बारे में सोचते रहने से देश व समाज की उन्नति संभव है। फरवरी का महीना है। चाहे महीने में हजारों कमाने वाला हो या लाखों सभी परेशान हैं कि कुछ ऐसा करो कि टैक्स के रूप में सरकार को एक पाई न देना पड़े। फर्जी कागजात बनाए या जुटाए जा रहे हैं ताकि टैक्स के दायरे से ज्यादा से ज्यादा बचा जा सके। क्या ऐसी मानसिकता वाले लोगों का समाज देश को कुछ दे सकेगा। ऐय्याशी व दारूबाजी पर भले साल में हजारों लाखों खर्च हो जाएं पर टैक्स देने के नाम पर ऐसे लोगों की नानी मरती दिखती है।
हो सकता है कि हमारे कर ढांचे में विसंगतियां हों, यह भी सही है कि बढ़ती महंगाई से तमाम लोग परेशान हैं। पर मंहगाई के चलते फाइव स्टार होटलों में लोगों ने ठहरना छोड़ दिया। सड़कों पर गाड़ियों की संख्या कम हो गई। हवाई जहाज में सीटे खाली रहने लगीं। फैशनेबिल चीजों की बिक्री घट गई। शायद नहीं। हर जगह पहले जैसी भीड़ व बिक्री बनी हुई है। लोग लाखों नहीं करोड़ों के फ्लैट खरीद रहे हैं। देश में लक्जरी कारों की बिक्री में इजाफा दर्ज किया गया है। सिगरेट व शराब की खपत तो हर वर्ष उम्मीद से ज्यादा बढ़ती जा रही है। सच यह है कि जो जितना ज्यादा पैसे बना रहा है वह उतना ही ज्यादा कर चोरी के लिए प्रयास भी करता नजर आता है।
क्या हो उपाय
आखिर सरकार को क्या उपाय अपनाने चाहिए कि जो लोग तमाम प्रयासों के बावजूद पैसा तो खूब बना रहे हैं पर कर देने से बच जाते हैं। जाहिर है पैसा रुपया खुद में उपभोग की बस्तु नहीं है। यह तो बिनिमय का माध्यम है। ज्यादा पैसा ज्यादा ऐय्याशी। सरकार को चाहिए की अति महंगी बस्तुओं पर भारी टैक्स लगाए। करोड़ों का मकान खरीदने वाला मोटा टैक्स दे पर दो कमरों का छोटा मकान खरीदने वालों को ऐसे कर से मुक्ति दी जानी चाहिए। इसी साल जुलाई से प्रापर्टी की खरीद पर लगाए गए सर्विस टैक्स के मामले में इस पद्धति को लागू किया जाना चाहिए। करोड़ों की कार खरीदने वाला किसी न किसी रूप में कर चोरी करता ही है। जिसे सरकारी संस्थाएं चाहें भी तो नहीं पकड़ सकती हैं। तो फिर करोड़ों की कार में सामान्य कार की तुलना में कई गुना लग्जरी टैक्स क्यों नहीं वसूल किया जाना चाहिए। इसी तरह लग्जरी व फैशन की तमाम ऊंची जीचों पर भारी टैक्स होना चाहिए। शराब व सिगरेट पर भी भारी टैक्स लगाना चाहिेए। यह टैक्स खपत के बजाय प्रोडक्शन सेंटर या आयात पर लगना चाहिए। क्योंकि वास्तविक खपत के बारे में झूठे आंकड़ों के चलते बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी होती है।
मिले सम्मान
सरकार व संस्थाओ द्वारा ऐसे लोगों को विशेष सम्मान दिया जाना चाहिए जो ज्यादा टैक्स चुकाते हैं। ऐसे लोगों को प्रिविलेज नागरिक अथवा प्रिविलेज कंपनी का दर्जा देना चाहिए। उन्हें कुछ जरुरी रियायतें भी दी जानी चाहिए। इसके ठीक विपरीत जो लोग टैक्स चोरी के करते पकड़े जाएं। उन्हें अलग श्रेणी में रखा जाए। तथा ऐसे लोगों पर कुछ मामलों में सीमित प्रतिबंध लगने चाहिए। यह सब कर चोरी संबंधी नियमों के तहत लगने वाले जुर्माने आदि से इतर हो। ऐसे लोगों के नाम क्षेत्रवार सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित भी किए जाने चाहिए ताकि वे सामाजिक सम्मान व अपमान के भागीदार हों।
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February 26, 2011
August 26, 2009
अफसर उवाच। सारी गलती इंद्र देव की
एक दिन की बारिश में सड़के बनी नाला, नेता व अफसर कर रहे हैं चिकचिक

राजधानी दिल्ली में पैसा है, रुतबा है लेकिन यदि नहीं दिखता तो सुखी व खुशहाल समाज। जिनके पास नहीं है उन्हें हर हाल में चाहिए चाहे जो करना पड़े और जिनके पास है उन्हें और चाहिए। दिल्ली के लोगों का यही जीवन दर्शन बनता जा रहा है। पिछले एक हफ्ते में शहर की गतिविधियों पर नजर डालें तो लगता ही नहीं कि यहां कुछ ऐसा हो रहा है जो पुरसुकून हो। पिछले हफ्ते जब मैं यह कालम लिख रहा था तो रिमझिम फुहारों के बीच लालकिले पर प्रधानमंत्री का भाषण चल रहा था। उन्होंने समस्याओं के अंबार के बीच ढेर सारी उम्मीदों की रोशनी बिखेरी। लगता था अपनी दिल्ली भी अब खुश रहेगी। ज्यादा न सही दो चार हफ्ते प्रधानमंत्री के भाषण का असर होने की तो उम्मीद थी ही लेकिन ऐसा हो न सका। शनिवार के भाषण के बाद सोमवार को सेंसेक्स छह सौ अंक से भी अधिक नीचे औंधे मुंह गिर गया। पैसे से पैसा बनाने वाले भाई लोग टेंशन में आ गए। दूसरी ओर सड़क पर लोगों का आटो वालों ने पसीना निकाल दिया। शहर में आटो वालों की हड़ताल व गुंडागर्दी दो दिन तक बेरोकटोक चलती रही। यद्यपि अपने सरदार जी ने टेंपो वालों को हड़काकर थोड़ा उम्मीद बंधाई कि पब्लिक की न सुनने वाले आटो वालों की भी नहीं सुनी जाएगी। अभी इस समस्या से निपटे भी न थे कि बारिश से कुछ धीमे पड़े स्वाइन फ्लू ने राजधानी में पहली बार किसी की जान ले ली। देश में भले ही इस बीमारी से मरने वालों का आंकड़ा पचास के आसपास पहुंचने वाला था लेकिन दिल्ली में यह पहली मौत थी। लोग फिर से इस विदेशी बीमारी से सहम गए। स्कूलों को कहा गया कि वे बच्चों से प्रेयर न कराएं। दुख में प्रभु का सुमिरन करने वाले देसी मन मानस को यह फैसला कुछ हजम नहीं हुआ लेकिन बच्चों की सुरक्षा की बात थी कुछ स्कूलों ने सरकार की बात मानी और सुबह की प्रेयर बंद हो गई। शुक्रवार का दिन फिर शहर वालों पर भारी पड़ा। इंद्रदेवता मेहरबान हुए और दोपहर बाद जमकर बारिश हुई। होना तो यह चाहिए था कि लोग खुश होते। इस बारिश ने जहां गर्मी से राहत दिलाई वहीं किसी हद तक किसानों व खेती के लिए भी यह फायदेमंद हो सकती है। लेकिन यहां तो दफ्तरों में दिनभर देश का भविष्य बांचने वाले बाबू लोग जब शाम को घर के लिए निकले तो चहुंओर पानी व ट्रैफिक का रेला। प्रतिदिन पीक आवर में रेंगने वाला ट्रैफिक बारिश के चलते थम सा गया था। ऐरों गैरों की तो छोड़ो राहुल बाबा तक को मेट्रो का सहारा लेना पड़ा। आधे घंटे की बरसात का पानी न जाने कहां-कहां घुस गया लेकिन जिन नालों व नालियों में घुसना था वहां का रास्ता बंद मिला। नाले व नालियों के नाम पर करोड़ों डकारने वाले अफसरों ने समस्या को जानने के लिए बैठक की। सबने मिलकर यह निष्कर्ष निकाला कि गलती किसी विभाग व अफसर की नहीं बल्कि इंद्रदेवता की है। भला इतनी जोर से बरसने की क्या जरूरत? आराम से रिमझिम-रिमझिम रात भर बारिश होती और सुबह दफ्तर के टाइम बारिश बंद हो जाती तो किसी को दिक्कत नहीं आती। अब बाबुओं की यह रिपोर्ट इंद्र देवता तक कैसे पहुंचे मालुम नहीं।
June 28, 2009
माननीयों को 'दूध घी' पर जनता को नसीब नहीं पानी
देश के अन्य राज्यों की भांति अब राजधानी के जनप्रतिनिधि भी चल पड़े हैं। उन्हें भी जनता के बीच जाने से डर लगने लगा है। इसलिए अब उन्हें चाहिए परमानेंट पुलिस सुरक्षा। पुलिस सुरक्षा के साथ वे लालबत्ती लगी गाड़ी की भी मांग रखने लगे हैं। दिल्ली सरकार लैपटाप व उसे चलाने के लिए दस हजारी सहायक देने की घोषणा पहले ही कर चुकी है। इन दिनों राजधानी में लोग पीने के पानी के लिए तरस रहे है लेकिन माननीय जनप्रतिनिधियों को उसकी चिंता नहीं है लेकिन उसी जनता के पैसों से वे अपने लिए सुविधाएं व आराम जुटाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। इस मामले में सत्ता व विपक्ष का भेद मिटाकर सभी माननीय विधायकगण एकजुट हैं। भाजपा के एक वरिष्ठ विधायक राजधानी में जनता के बीच खुद को असुरक्षित मानते हुए कहते हैं कि भूमाफिया से विधायकों को डर क्योंकि वे विधायकों पर हमला कर सकते हैं। लेकिन सच सभी जानते हैं। ज्यादातर माननीयों के संरक्षण में ही ऐसे भूमाफिया फलफूल रहे हैं। हां दिल्ली में ला-आर्डर की सामान्यत: हालात ऐसी जरूर बनती जा रही है कि कहीं भी कभी भी किसी भी आम आदमी के साथ आपराधिक वारदात हो सकती है। ऐसे में सिर्फ माननीयों की सुरक्षा की बात कितनी बेमानी है। जनता के पैसों से दूध मलाई खाने की यह कोई पहला उदाहरण नहीं होगा। नगर निगम में माननीय पार्षदों के लैपटाप की कथा मीडिया में आए दिन छपती रही है। करोड़ों रुपये के लैपटाप खरीदकर पार्षदों को दे दिए गए तो वे भी लैपटाप चलाने के लिए सहायक मांगने लगे। अलबत्ता कई पार्षद तो डिजिटल वर्ड के लिहाज से निरक्षर थे लेकिन लैपटाप लेने तथा सहयोगी के नाम पर कुछ हजार रुपये महीने की मांग में वे सबसे आगे दिखाई देते थे। क्योंकि जनता के पैसे से मुफ्त की मलाई खाने में वे पीछे नहीं रहना चाहते हैं। अब यही वाकया विधानसभा में दुहराया जा रहा है। सत्तर विधायक तो सत्तर लैपटाप खरीदे जा रहे हैं। सभी माननीय विधायकों को दस-दस हजार रुपया नकद इस बात के लिए दिए जाने की तैयारी है कि वे इस पैसे एक ऐसा सहायक रखेंगे जो लैपटाप चला सके। अब इनसे कौन पूछे कि जो साहब लैपटाप चलाना ही नहीं जानते उन्हें लैपटाप पर क्या करना है यह कौन सिखाएगा। क्या भविष्य में वे इसके लिए अलग के एक सलाहकार भी मांगेगे? हां राजधानी के यह लैपटाप युक्त विधायक जनता के घरों में पानी व बिजली की आपूर्ति के लिए भी कुछ करते दिखाई देंगे। राजधानी में उद्योग धंधे चौपट हो रहे हैं। क्या फिर से उनके विकास के लिए यह कुछ कर सकेंगे। यह सवाल भी उठेगा मगर सरकारी सुरक्षा में लैपटाप मिलने के बाद। जाहिर है।
June 01, 2009
सड़क पर पप्पुओं के खिलाफ हमें आपको भी आगे आना होगा
शहर की सड़कों पर लोगों को सुरक्षित रखने के लिए दिल्ली पुलिस फिर सप्ताह मना रही है। इसके तहत सप्ताह भर पूरे शहर में विशेष चौकसी, नियमों का पालन न करने वालों पर कार्रवाई, चालान, प्रेस कांफ्रेंस, अखबारों में उपलब्धियों की फोटो छपवाना जैसे काम शामिल रहेगा। उसके बाद? हम व आप तो अगले हफ्ते भी इसी सड़क से गुजरेंगे। तब क्या होगा? यही वह सवाल है जो पुलिस के सड़क सुरक्षा सप्ताह पर सवालिया निशान लगा देता है। हर साल यहां की सड़कों पर दो हजार से ज्यादा लोग दुर्घटना में दम तोड़ देते हैं। इनमें आधे से अधिक ऐसे लोग होते हैं जो किसी वाहन पर सवार नहीं होते, बल्कि पैदल चल रहे होते हैं। अब पुलिस हर वाहन चालक के पीछे तो चल नहीं सकती, इसलिए राजधानी में वाहन चलाने वालों के लिए सड़क के नियमों के प्रति ज्यादा सतर्कता के लिए सिर्फ पुलिस का सप्ताह व पखवाड़ा अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा। जिस तरह दिल्ली के चुनाव में मतदान के लिए पप्पू अभियान में तमाम संगठन, मीडिया व संस्थाओं ने भागीदारी की थी, उसी तरह ट्रैफिक सेंस बहाल करने के लिए भी प्रयास करने की जरूरत है। लेकिन इससे पहले दिल्ली पुलिस खासकर ट्रैफिक पुलिस को अपना चाल-चलन सुधारना होगा। आम आदमी तभी इस अभियान से जुड़ेगा। नई दिल्ली के युवा सांसद अजय माकन दिल्ली वालों के सौभाग्य से केंद्र में गृह राज्यमंत्री बन गए हैं। वे भी अपनी साफ-सुथरी छवि का इस अभियान में इस्तेमाल कर सकते हैं। माकन साहब, वैसे भी चुनाव के दिनों में आपने रैली न निकालकर जताया था कि आप ट्रैफिक जाम से लोगों को बचाना चाहते हैं। अब आप जनता के सहयोग से मंत्री बन गए हैं तो लोगों को उम्मीद है कि सड़क पर ट्रैफिक से जाने वाले जिंदगियों को बचाने के लिए भी कुछ जरूर करेंगे। जब तक सड़क पर चलने वाला हर वाहन चालक व पैदल यात्री ट्रैफिक नियमों को दिल से इज्जत नहीं देगा, तब तक वह इस पर ईमानदारी से अमल भी नहीं करेगा। केवल चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस खड़ी कर देने से अथवा चौराहों के पीछे छिपकर नियमों का उल्लंघन करने वालों को पकड़कर चालान काट देने भर से न तो सड़कों पर खूनी खेल थमेगा, न बहुमूल्य जिंदगियों को बचाया ही जा सकेगा।
दिल्ली पुलिस के मुखिया युद्धवीर सिंह डडवाल ने डेढ़ साल पहले जब पदभार संभाला था तो उन्होंने कहा था कि राजधानी में किसी भी अपराध से ज्यादा सड़क हादसों में लोगों की मौत होती है। वे प्राथमिकता के आधार ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार करके इन मौतों पर अंकुश लगाएंगे। यदि वे अपने प्रयास से कुछ जिंदगियां बचा पाएं तो किसी भी अन्य अपराध को रोकने से यह काम ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। लेकिन ऐसा हो न सका। लोग अब भी सड़कों पर कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे हैं। जनवरी 2009 से अब तक पांच माह में राजधानी की सड़कों पर दुर्घटना में आठ सौ लोगों की जान जा चुकी है। इनमें से आधे लोग या तो पैदल राहगीर थे या सड़क पार कर रहे थे। ऐसा नहीं है कि इन हादसों में मरने वाले पैदल यात्रियों की गलतियां नहीं होती हैं, लेकिन यहां सवाल है कि दिल्ली की सड़कों पर सालाना होने वाली हजारों मौत का खेल आखिर कब तक जारी रहेगा। इसे रोकने के लिए केवल पुलिस ही नहीं हम सबको आगे आना होगा।
दिल्ली पुलिस के मुखिया युद्धवीर सिंह डडवाल ने डेढ़ साल पहले जब पदभार संभाला था तो उन्होंने कहा था कि राजधानी में किसी भी अपराध से ज्यादा सड़क हादसों में लोगों की मौत होती है। वे प्राथमिकता के आधार ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार करके इन मौतों पर अंकुश लगाएंगे। यदि वे अपने प्रयास से कुछ जिंदगियां बचा पाएं तो किसी भी अन्य अपराध को रोकने से यह काम ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। लेकिन ऐसा हो न सका। लोग अब भी सड़कों पर कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे हैं। जनवरी 2009 से अब तक पांच माह में राजधानी की सड़कों पर दुर्घटना में आठ सौ लोगों की जान जा चुकी है। इनमें से आधे लोग या तो पैदल राहगीर थे या सड़क पार कर रहे थे। ऐसा नहीं है कि इन हादसों में मरने वाले पैदल यात्रियों की गलतियां नहीं होती हैं, लेकिन यहां सवाल है कि दिल्ली की सड़कों पर सालाना होने वाली हजारों मौत का खेल आखिर कब तक जारी रहेगा। इसे रोकने के लिए केवल पुलिस ही नहीं हम सबको आगे आना होगा।
December 31, 2008
'' बच्चा गायब हो गया तो क्या हुआ, और पैदा कर लो ''
आज कई दिनों के बाद सोच रहा था कि ब्लाग पर कुछ लिखा जाए। लेकिन आखिर वह क्या बात है जिसे हम लोगों को बताना चाहें। काफी देऱ से यह विचार कर ही रहा था कि एक व्यक्ति में मेरे पास आया और एक लिफाफा देकर बिना कुछ कहे चला गया। उत्सुकतावश मैने उसे खोला तो उसमें ब्लैक एंड ह्वाइट रंग तस्वीर वाली एक मैगजीन थी। समाज के विभिन्न तबकों के हितों के लिए कुछ न कुछ करते रहने वाले एक संगठन ने इस मैगजीन को निकाला था। मैगजीन का कवर स्टोरी राजधानी में गुम होते बच्चों पर आधारित थी। इस पुस्तक में बड़े ही विस्तार से दिल्ली में गायब हो रहे बच्चों के बारे में जानकारी थी। लब्बो लुबाब यह था कि हजारों की संख्या में गुम होने वाले इन बच्चों में से ज्यादातर गरीब परिवारों के बच्चे होते हैं। जिनकी फिकर सिर्फ चुनाव के दिनों में नेता लोग कर लेते हैं आइंदा किसे फुरसत है कि गरीब के साथ क्या हो रहा है। इस मैगजीन में किए गए दावों को अगर माने तो दिल्ली पुलिस ने बच्चों के गायब होने के ९० प्रतिशत मामलों को दर्ज ही नहीं किया है। रिपोर्ट में सबसे अधिक पुलिस के संवेदनहीन रवैये का जिक्र किया गया है। जैसे जब गरीब घरों के लोग बच्चों के गायब होने के बाद थानों में जाकर पुलिस से उन्हें ढूंढ़ने में मदद करने को कहते हैं तो वे कहते हैं कि '' बच्चा गायब हो गया तो क्या हुआ, और पैदा कर लो। ''
इस पत्रिका में ८२ बच्चों के बारे मे डिटेल भी दी गई है।
इस पत्रिका में ८२ बच्चों के बारे मे डिटेल भी दी गई है।
November 07, 2008
लोकतंत्र के यज्ञ में गायब आम आदमी
दोस्तों लंबे समय बाद कुछ लिखने की मनःस्थिति बना पाया हूं। ये जो शहर है दिल्ली यहां कुछ लोग पूरे शहर को अपने हिसाब से चलाते हैं जबकि ज्यादातर लोग शहर के हिसाब से चलने को मजबूर होते हैं। यह शहर कई बार आपकी प्राथमिकताओं को बदल देता है। रोज कुछ लिखूं पर यह हो नहीं पाता है।
दिल्ली में इन दिनों राजनीति का मौसम है। पार्टियों द्वारा टिकट का वितरण लगभग पूरा हो चुका है। किसको क्यों टिकट मिला क्यों कट गया इस पर बहुत कुछ अखबारों में लिखा जा चुका है। चैनल दिन रात संतुष्ट व असंतुष्ट नेताओं के चेहरे दिखा रहे हैं। किंतु यदि ध्यान दें तो इस लोकतंत्र के कथित पावन पर्व में नहीं दिख रहा है तो दिल्ली का आम आदमी। आखिर दिल्ली में सरकार बनाने वाले ही इस सरकार के गठन के समय अदृश्य क्यों हैं। नेता अपने तरीके से बता रहे हैं की दिल्ली के लोगों की दिक्कत क्या है। उन्हें क्यों कांग्रेस अथवा भाजपा को वोट नहीं देना चाहिए। नेता ही तय कर रहे हैं कि जनता इस चुनाव में किस आधार पर अपने विधायक को चुने। वास्तव में दिल्ली के लोग दिल्ली की प्रदेश सरकार से क्या चाहते हैं। उन्हें दिल्ली की शीला सरकार से क्या शिकायत थी अथवा आने वाले समय में वे दिल्ली में किसकी कैसी सरकार चाहते हैं। यह न तो किसीको जानने की फुरसत है और न ही जरुरत। लोग भी मीडिया में देख पढ व सुन रहे हैं कि दिल्ली में चुनाव हो रहे हैं किंतु वे खुद को इस चुनाव से कहीं जुड़ा नही महसूस कर रहे हैं। कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं, सत्ता के दलालों अथवा मीडिया को छोड़ दें तो दिल्ली में कहीं चुनाव को लेकर कोई विचार व मंथन नहीं दिखाई दे रहा है। क्या सही मायने में किसी लोकतांत्रिक सरकार के चुने जाने के समय आम आदमी की यह उदासीनता लोकतंत्र की सफलता पर सवालिया निशान नहीं लगाता है? हो सकता है कि नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़े, अफसर भी चुनाव की प्रक्रिया को पूरा कर लें। कोई मुख्यमंत्री तो कोई मंत्री की कुर्सी पर जम जाए। अगले पांच साल तक जनता की मर्जी के नाम पर वे फैसले लेते रहें। लेकिन आखिर कब तक यह सब चलेगा। जब लोगों को इस तंत्र पर भरोसा ही नहीं रह जायेगा तो इस तंत्र की अहमियत भी नहीं रह जाएगी। जिसके चलते सरकारों के फैसलों पर लोग महत्व देना छोड़ देंगे। सरकारों की विश्वसनीयता गिरते ही पूरा लोकतंत्र ढहने की कगार पर पहुंच जाएगा। इस सब के बाद क्या होगा इसका सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है।
दिल्ली में इन दिनों राजनीति का मौसम है। पार्टियों द्वारा टिकट का वितरण लगभग पूरा हो चुका है। किसको क्यों टिकट मिला क्यों कट गया इस पर बहुत कुछ अखबारों में लिखा जा चुका है। चैनल दिन रात संतुष्ट व असंतुष्ट नेताओं के चेहरे दिखा रहे हैं। किंतु यदि ध्यान दें तो इस लोकतंत्र के कथित पावन पर्व में नहीं दिख रहा है तो दिल्ली का आम आदमी। आखिर दिल्ली में सरकार बनाने वाले ही इस सरकार के गठन के समय अदृश्य क्यों हैं। नेता अपने तरीके से बता रहे हैं की दिल्ली के लोगों की दिक्कत क्या है। उन्हें क्यों कांग्रेस अथवा भाजपा को वोट नहीं देना चाहिए। नेता ही तय कर रहे हैं कि जनता इस चुनाव में किस आधार पर अपने विधायक को चुने। वास्तव में दिल्ली के लोग दिल्ली की प्रदेश सरकार से क्या चाहते हैं। उन्हें दिल्ली की शीला सरकार से क्या शिकायत थी अथवा आने वाले समय में वे दिल्ली में किसकी कैसी सरकार चाहते हैं। यह न तो किसीको जानने की फुरसत है और न ही जरुरत। लोग भी मीडिया में देख पढ व सुन रहे हैं कि दिल्ली में चुनाव हो रहे हैं किंतु वे खुद को इस चुनाव से कहीं जुड़ा नही महसूस कर रहे हैं। कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं, सत्ता के दलालों अथवा मीडिया को छोड़ दें तो दिल्ली में कहीं चुनाव को लेकर कोई विचार व मंथन नहीं दिखाई दे रहा है। क्या सही मायने में किसी लोकतांत्रिक सरकार के चुने जाने के समय आम आदमी की यह उदासीनता लोकतंत्र की सफलता पर सवालिया निशान नहीं लगाता है? हो सकता है कि नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़े, अफसर भी चुनाव की प्रक्रिया को पूरा कर लें। कोई मुख्यमंत्री तो कोई मंत्री की कुर्सी पर जम जाए। अगले पांच साल तक जनता की मर्जी के नाम पर वे फैसले लेते रहें। लेकिन आखिर कब तक यह सब चलेगा। जब लोगों को इस तंत्र पर भरोसा ही नहीं रह जायेगा तो इस तंत्र की अहमियत भी नहीं रह जाएगी। जिसके चलते सरकारों के फैसलों पर लोग महत्व देना छोड़ देंगे। सरकारों की विश्वसनीयता गिरते ही पूरा लोकतंत्र ढहने की कगार पर पहुंच जाएगा। इस सब के बाद क्या होगा इसका सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है।
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